अब छाया है संकट, अमेरिकी महाद्वीप के बराबर हैं दुनियाभर में मौजूद ग्‍लेशियर

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नई दिल्‍ली। ग्लोबल वार्मिग के चलते दुनिया भर में तेजी से ग्लेशियर यानी हिमनद पिघल रहे हैं। इसके चलते मानवता के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। करोड़ों लोग बाढ़ की समस्या से घिर सकते हैं। सूखे की चपेट में आ सकते हैं। पेयजल की किल्लत हो सकती है। 

स्वच्छ जल के सबसे बड़े स्नोत

दुनिया भर के ग्लेशियरों को मिला दिया जाए तो इनका आकार दक्षिण अमेरिका महाद्वीप जितना होता है। ये आज स्वच्छ पानी के सबसे बड़े भंडार हैं। इनके पिघलने की शुरुआत 1850 के बाद शुरू हुई लेकिन हाल के दशकों में इस प्रक्रिया में अप्रत्याशित तेजी आई है।

बढ़ता तापमान

जिस तरह से अगली सदी तक वैश्विक तापमान में वृद्धि का आकलन किया जा रहा है, उससे अनुमान है कि इनके पिघलने की दर और तेज होगी। 21वीं सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान में 1.4 से 5.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। साथ ही यह भी अनुमान है कि अगर दुनिया के औसत तापमान में चार फीसद की वृद्धि हो जाती है तो धरती ग्लेशियरों से विहीन हो सकती है।

खतरे में प्रकृति

रॉयल बंगाल टाइगर: दुनिया की यह संरक्षित प्रजाति अपने सबसे बड़े आवास सुंदरवन के एक बड़े हिस्से को खो देगी अगर समुद्र का स्तर बढ़ता है।

किटलिट्ज मुर्रलेट: जितना दुर्लभ ये पक्षी है, उतनी ही रोचक इसकी कहानी है। ये एकमात्र ऐसी पक्षी प्रजाति है जो ग्लेशियर के पानी से बने आभासी बादलों में अपना शिकार करती है। साथ ही ग्लेशियर की सबसे ऊंची बर्फ पर ही अपना घोंसला बनाती है।

कोरल रीफ: अगर समुद्र तल बढ़ता है तो समुद्र में मौजूद ये विशिष्ट संरचना खत्म हो सकती है। ऊंचा स्तर होने से सूर्य से जरूरी ऊर्जा इसे नहीं मिल पाएगी।

संकेत अच्छे नहीं

1960 से दुनिया भर के ग्लेशियरों से करीब चार हजार घन किमी पानी का नुकसान हुआ। ये मात्र दुनिया की बड़ी नदियों ओरिनोको, कांगो, यांग्सी और मिसिसिपी के सालाना प्रवाह से भी अधिक है।

तेज नुकसान

एशिया: पिछले तीस साल से हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। भूटान में ये ग्लेशियर करीब 30-40 मीटर सालाना की दर से घट रहे हैं। कजाखस्तान में 1955 से दो वर्ग किमी प्रति साल की दर से ग्लेशियरों से बर्फ पिघल रही है। किर्गिस्तान में अक-शिराक रेंज के ग्लेशियर 1977 से अपने क्षेत्रफल का एक चौथाई खत्म हो चुके हैं। चीन के ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं।

जीवन के स्नोत

अंतरिक्ष से जब हम अपने ग्रह को देखते हैं तो यह हमें एक जलीय ग्रह दिखाई देता है, लेकिन यहां मौजूद अधिकांश पानी खारा है जो इंसानों के पीने लायक नहीं है। धरती पर मौजूद कुल पानी का सिर्फ 2.5 फीसद स्वच्छ है और एक फीसद के सौवें हिस्से से भी कम पीने योग्य पानी है जो हर साल बारिश से रिचार्ज होता रहता है।

पानी की कमी- धरती का 70 फीसद स्वच्छ जल ग्लेशियरों में जमा है जो प्रतिकूल हालात में इंसानी सभ्यता को बचाने में किसी अमृत सरीखा होता है। ट्रॉपिकल क्षेत्रों में ग्लेशियर साल भर पिघलते रहते हैं और नदियों को सदानीरा बनाकर तमाम जरूरतों को पूरा करते हैं।

हिमालय के ग्लेशियरों से एशिया की सात बड़ी नदियां निकलती हैं। गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, सालवीन, मेकांग, यांग्सी और हुवांग हे। ये नदियां साल भर दो अरब लोगों की जल से जुड़ी हर जरूरतों को पूरा करती हैं। अंदाजा लगाइए कि अगर ग्लेशियर से पानी पिघलकर गंगा में न आए तो जुलाई से सितंबर के दौरान जीवनदायिनी का बहाव दो तिहाई कम हो जाएगा। देश के पचास करोड़ लोगों को पानी की किल्लत से जूझना पड़ेगा और देश की 37 फीसद जमीन से सिंचित क्षेत्र होने का तमगा हट जाएगा।

समाधान के सूत्र

अब ये तथ्य स्थापित हो चुका है कि मानवजनित गतिविधियों से कार्बन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिग की समस्या बढ़ रही है। यही प्रतिकूल मौसमी परिस्थिति हमारे ग्लेशियरों को समय से पहले और तेज रफ्तार से पिघला रही है जिसके परिणामस्वरूप हिमस्खलन जैसी घटनाएं चमोली आपदा के रूप में हमारे सामने आती हैं। इससे बचने के लिए पूरी दुनिया को एकजुट होना होगा और वैश्विक मंचों पर तय तमाम संधियों और उपायों को तेजी से लागू करना होगा।

  • पेरिस जलवायु संधि को प्रभावी रूप से लागू करना होगा और कार्बन उत्सर्जन में कटौती के अपने लक्ष्यों को हासिल करना होगा
  • जब जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल होता है तो सबसे ज्यादा कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। कोयला तो गैस के मुकाबले 70 फीसद ज्यादा उत्सर्जन करता है। मानवजनित कार्बन उत्सर्जन में बिजली बनाने की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। दुनिया में 37 फीसद उत्सर्जन इसी मद में किया जाता है। दुनिया के ऊर्जा क्षेत्र को कार्बन डाईऑक्साइड मुक्त किए जाने की दरकार है। पहले औद्योगिक देशों से इसकी शुरुआत होनी चाहिए। बाद में तकनीकी और आर्थिक मदद के साथ गरीब और विकासशील देशों में भी लागू किया जाए।
  • उत्सर्जन बढ़ाने वाले उद्यमों को हतोत्साहित करने के लिए सरकारें योजना ला सकती हैं। हरित तकनीक में निवेश में सहूलियत दी जा सकती है।
  • लोगों को भी ग्लोबल वार्मिग के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया जाए। आम लोग ही लड़ाई के सबसे बड़े योद्धा साबित होंगे। अगर एक बार उनमें चेतना आ गई कि चमोली जैसी घटना अब हमें नहीं होने देनी है तो वे अपने आचार, विचार और व्यवहार में उत्सर्जन करने वाली प्रक्रियाओं में कमी लाएंगे। अपनी सोच, संस्कृति और जीवनशैली में वे अवश्य बदलाव लाएंगे।

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