आलू की फसल को पिछेती झुलसा बीमारी से बचायें

0
72

सीतापुर: जिला उद्यान अधिकारी सौरभ श्रीवास्तव ने बताया कि वातावरण में तापमान में गिरावट एवं बंूदा-बांदी की स्थिति में आलू की फसल पिछेती झुलसा रोग के प्रति अत्यन्त संवेदनशील है। प्रतिकूल मौसम विशेषकर बदलीयुक्त बंूदा-बांदी एवं नम वातावरण में झुलसा रोग का प्रकोप बहुत तेजी से फैलता है तथा फसल को भारी क्षति पहुॅंचती है। पिछेती झुलसा रोग की रोक-थाम के लिए केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ द्वारा निम्नलिखित दवाओं के छिड़काव की सलाह दी गयी है।

जिन कृषकों द्वारा आलू की फसल में अभी तक फफॅूदनाशक दवा का पर्णीय छिड़काव नहीं किया है या जिनकी आलू की फसल में अभी पिछेता झुलसा बीमारी प्रकट नहीं हुई है, उन सभी किसान भाईयों को यह सलाह दी जाती है कि वे “मैन्कोजेब/प्रोपीनेब/ क्लोरोथेलोंनील युक्त फफूंदनाशक दवा का 2.0-2.5 किलोग्राम दवा 1000लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव तुरन्त करें। जिन खेतों में बीमारी प्रकट हो चुकी हो उनमें किसी भी फफंूदनाशक-साईमोक्सेनिल$मैन्कोजेब का 3.0किलोग्राम प्रति हैक्टेयर (1000लीटर पानी) की दर से अथवा फेनोमिडोन$मैन्कोजेब का 3.0किलोग्राम प्रति हैक्टेयर (1000लीटर पानी) की दर से अथवा डाईमेथोमार्फ 1.0किलोग्राम$मैन्कोजेब का 2.0किलोग्राम (कुल मिश्रण 3.0कि0ग्रा0) प्रति हैक्टेयर (1000लीटर पानी) की दर से छिड़काव करें।” यदि बारिश की सम्भावना बनी हुई है, तो फफॅूदनाशक के साथ स्टिकर (चिपचिपा) को 0.1प्रतिशत की दर से मिलाकर छिड़काव करें। फफूॅदनाशक को दस दिन के अन्तराल पर दोहराया जा सकता है, लेकिन बीमारी की तीव्रता के आधार पर इस अन्तराल को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। किसान भाईयों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि एक ही फफूॅदनाशक का बार-बार छिड़काव न करें। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here