खूब वादे किए जाते हैं अग्निकांड के समय, बाद में भूल जाते हैं जिम्मेदार

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लालकुआं। गौला नदी के निकासी गेटों पर रहने वाले मजदूरों की झोपडिय़ों में आग लगना आम बात हो गई है। श्रमिक कल्याण के नाम पर लाखों रुपये वसूलने के बावजूद वन निगम मजदूरों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं कर रहा है। अप्रैल 2016 को मोटाहल्दु खनन गेट में स्थित श्रमिकों की झोपड़ी में भीषण आग लग गई थी। अग्निकांड में मजदूरों की करीब सौ  झोपड़ि‍यों के जलने के साथ ही झारखंड निवासी मजदूर गुलाब की पत्नी व छह वर्षीय पुत्र की जलकर मौत हो गई थी। उस समय दमकल के आधा दर्जन वाहनों ने कई फेरे पानी लाकर चार घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया। वहीं, 20 अप्रैल 2019 को बेरीपड़ाव निकासी गेट पर मजदूरों की झोपड़ी में आग लग गई। जिसमें गोरखपुर निवासी मनोज पाल के 16 दिन के नवजात पुत्र राजा की जलकर मौत हो गई थी।

मार्च 2018 व मई 2016 को बेरीपड़ाव खनन निकासी गेट में लगभग एक दर्जन झोपडिय़ां जलकर राख हो गई थी। देखा गया है कि जब जब आग लगती है तो अधिकारी व सत्तासीन जनप्रतिनिधि मजदूरों के कल्याण के लिए तमाम दावे करके वाह वाही लूट कर चले जाते है। लेकिन वहां से जाने के बाद कभी भी इस समस्या का समाधान नहीं निकाला जाता है। गत वर्षो लगी आग के बाद वन निगम के अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों ने मजदूरों के रहने के लिए गौला निकासी गेटों पर टिन शेड बनाने का वादा किया था, लेकिन आज तक यह वादे हवाई ही साबित हुए।

वादों के सहारे करोड़ों के राजस्व की मुख्य कड़ी

सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व देने वाली गौला नदी की मेन कड़ी मजदूरों के कल्याण के लिए वन निगम व जिला प्रशासन लापरवाह बना हुआ है। जनप्रतिनिधि व अधिकारी मजदूरों को कंबल वितरण, स्वास्थ्य व उनके बच्चों के पढ़ाई को लेकर बड़े-बड़े दावे करते रहते हैं। लेकिन धरातल में कुछ भी नहीं दिखाई देता है। मजदूरों का कहना था कि पूरी ठंड बीतने के बाद उन्हें वन निगम द्वारा कंबल व अन्य सामान दिया गया। वह भी अग्निकांड में स्वाहा हो गया।

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