समाज और न्यायपालिका को बाल यौन अपराध की घटनाओं के प्रति संवेदनशील बनने की जरूरत

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हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने यौन उत्पीड़न संबंधी एक मामले में फैसला सुनाया कि किसी नाबालिग के कपड़े उतारे बिना उसके वक्षस्थल को छूना यौन हमला नहीं कहा जा सकता। इस तरह की हरकत को बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत यौन हमले के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने 19 जनवरी को पारित एक आदेश में कहा कि किसी हरकत को यौन हमला माने जाने के लिए गंदी मंशा से त्वचा से त्वचा का संपर्क होना जरूरी है। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता।

इस फैसले ने कई संवेदनशील सवाल खड़े कर दिए हैं। यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस विवादास्पद फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की और सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने 27 जनवरी को इस विवादास्पद फैसले पर रोक लगा दी है और ऐसे में सब की निगाहें सर्वोच्च अदालत पर टिक गई हैं। शीर्ष अदालत ने उच्च अदालत के असंवेदनशील फैसले पर रोक लगाकर सही कदम उठाया, क्योंकि उच्च अदालत का यह फैसला दरअसल बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) 2012 की मंशा बाल संरक्षण के उलट है। दरअसल नाबालिग बच्चों के खिलाफ यौन हमले, यौन उत्पीड़न एक अति गंभीर संवेदनशील मामला है और इसी भावना को समझते हुए इससे संबंधित कानून भी बनाए गए हैं। मगर कई मर्तबा अदालतें ठोस साक्ष्य नहीं होने की दलील आदि देकर आरोपी के प्रति अधिक कड़ा रुख अपनाने से गुरेज करती हैं। लिहाजा सर्वोच्च अदालत से उम्मीद की जा रही है कि वह इस मामले पर विस्तार से चर्चा कर कानून व मानवीयता दोनों को ध्यान में रख एक नजीर पेश करेगी।

दरअसल यह मामला नागपुर में दिसंबर 2016 का है और आरोपी सतीश पर यह आरोप है कि वह 12 साल की नाबालिग लड़की को कुछ खिलाने के बहाने अपने घर ले गया था, जहां उसके वक्षस्थल को छुआ। पीड़ित बच्ची ने बताया कि 39 साल के सतीश ने उसके शरीर को छूने और निर्वस्त्र करने की कोशिश की थी। पीड़ित बच्ची के इस बयान को अहम मानते हुए नागपुर की एक सत्र अदालत ने आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत तीन साल और आइपीसी के तहत एक साल की सजा सुनाई थी। आरोपी ने सत्र अदालत के इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील की और उच्च अदालत ने सत्र अदालत के आदेश में संशोधन करते हुए दोषी को पॉक्सो एक्ट के तहत बरी कर दिया और आइपीसी की धारा 354 में एक साल की कैद बरकरार रखी। उच्च अदालत ने कहा कि यह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने का अपराध बनता है। लेकिन इसके साथ यह भी साफ कर दिया कि चूंकि व्यक्ति ने बच्ची के बदन से कपड़े हटाए बिना उसका स्पर्श किया था, इसलिए उसे यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है।

दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ के इस फैसले से पॉक्सो एक्ट की मूल भावना को ही एक तरह से ठेस पहुंची है और इससे यही ध्वनित होता है कि कपड़ों के ऊपर से गलत मंशा से छूना कोई बड़ा अपराध नहीं है। आने वाले वक्त में क्या इस दलील का समाज में अपराधी प्रवृत्ति वाले बेजा इस्तेमाल नहीं करेंगे? क्या लड़की के बदन पर कपड़े होने की दलील का इस्तेमाल आरोपी के लिए एक सुरक्षा कवच का काम नहीं करेगा? क्या यह सही है कि किसी नाबालिग को छूना केवल इसलिए वैध मान लिया जाएगा, क्योंकि त्वचा का त्वचा से संपर्क नहीं हुआ है। पूरे कपड़ों में क्या शोषण नहीं किया जा सकता। ऐसे में तो भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों, सार्वजनिक परिवहन व सूनी जगहों पर कपड़े पहने लड़कियों/ बच्चियों के साथ छेड़छाड़, वक्षस्थल को छूने सरीखी घटनाएं भी पॉक्सो के तहत अपराध नहीं मानी जा सकतीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी को कपड़े के ऊपर से छूना पॉक्सो एक्ट के तहत यौन हमले की श्रेणी में नहीं आता।

बाल अधिकार संगठनों के कड़े संघर्ष के बाद बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) 2012 बनाया गया। यह अधिनियम यह स्वीकार करता है कि बच्चों को खास तौर पर निशाना बनाया जा सकता है, लिहाजा जब पीड़ित कोई बच्चा हो तो उसके संरक्षण के लिए विशेष कदम, आइपीसी से परे कानून की जरूरत होती है। अधिनियम के तहत कड़ी सजा का प्रविधान महज इसलिए नहीं किया गया है कि यह मामला अवैध यौन हरकत का है, बल्कि इसलिए किया गया है, क्योंकि यह एक नाबालिग से ताल्लुक रखता है, जिस पर यौन हमले होने का खतरा अधिक रहता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले, जिसके आधार पर उसे पॉक्सो के तहत न्यूनतम तीन साल की सजा दी जा सके। लिहाजा अदालत उसे नाबालिग की गरिमा को ठेस पहुंचाने के जुर्म में आइपीसी की धारा 354ए के तहत एक साल की सजा बरकरार रखती है।

बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न/ यौन हमले के मामले बढ़ रहे हैं और ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने की दर भी कम है। इसकी कई वजहों में एक तरफ अदालतों व उनसे संबंधित ढांचे, स्टाफ की कमी तो दूसरी तरफ पुलिस व न्यायपालिका में कार्यरत अधिकारियों व कर्मचारियों को बाल पीड़ितों के साथ हमदर्दी से निपटने वाले प्रशिक्षण देने की कमी आदि हैं। उम्मीद है कि सर्वोच्च अदालत इस विवादास्पद फैसले के उस बिंदु की स्पष्ट व्याख्या कर बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) 2012 को बल प्रदान करेगी।

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