ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों को आइपीएल नीलामी से हुआ फायदा- सुनील गावस्कर

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आइपीएल की मिनी नीलामी ने फिर से दिखा दिया कि कुछ के लिए यह वास्तव में लॉटरी है और कुछ के लिए लॉटरी बार-बार आती है। टीमें बहुत अच्छे से होमवर्क करती हैं और जानती हैं कि उन्हें अपनी टीमों को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्हें पता है कि कौन सी जगह भरनी है और किस खिलाड़ी की जरूरत है इसलिए बीसीसीआइ ने कुछ खिलाड़ियों की सूची जारी की जबकि नीलामी के लिए कई हजार नाम शामिल थे। फिर सूची में शामिल अंतिम खिलाड़ियों की नीलामी शुरू हो जाती है जिसमें बहुत करोड़पति बन जाते हैं जबकि कुछ खुद को यह सांत्वना देते हैं कि वे इस संख्या को पाने से चूक गए या इससे अधिक पा सकते थे।

नीलामी में, जब किसी खिलाड़ी का नाम आता है तो भाग्य भी अहम भूमिका निभाता है। अगर फ्रेंचाइजी के पास अधिक राशि है तो वे ज्यादा बड़ी बोली तक लगा देते हैं और जब उनके पास राशि कम होती है तो उनका उत्साह भी कम हो जाता है। खिलाड़ी भी अपने आधार मूल्य से अधिक राशि पा लेते हैं। एक बार फिर इस साल ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों ने बड़ी कमाई की जो आश्चर्यचकित करता है कि फ्रेंचाइजियों के कोच और क्रिकेट निदेशक ज्यादातर उन देशों के ही होते हैं।

आठ फ्रेंचाइजी में से छह के कोच और क्रिकेट निदेशक ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के हैं। अनिल कुंबले और महेला जयवर्धने ही ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के नहीं हैं और जयवर्धने के मार्गदर्शन में मुंबई इंडियंस ने लगातार दो बार खिताब जीता है। भारतीय क्रिकेट टीम शीर्ष स्तर का क्रिकेट खेल रही है और इसमें पूरा सहयोगी स्टाफ भारतीय है जो दिखाता है कि भारत में कोचिंग की प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन सभी दिखाना चाहते हैं कि वे भी काम कर सकते हैं।

एक बात याद रखने की जरूरत है कि विदेश के क्रिकेट संघों को फ्रेंचाइजी द्वारा चयनित किए गए खिलाडि़यों की मैच फीस का 10 प्रतिशत मिलता है इसलिए प्रत्येक नीलामी के बाद ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के क्रिकेट बोर्ड अमीर हो जाते हैं। हालांकि फ्रेंचाइजियों द्वारा खिलाडि़यों की मैच का फीस का प्रतिशत और इसमें से कितनी कटौती की गई है या नहीं इसको लेकर मैं निश्चित नहीं हूं। जो भी हो, विदेशी बोर्ड आइपीएल के लिए अपने खिलाडि़यों को रिलीज करने से खुश हैं।

वेस्टइंडीज और दक्षिण अफ्रीका जैसे क्रिकेट बोर्ड हाल के दिनों में संघर्ष कर रहे हैं और वे भी आइपीएल नीलामी पर नजरें रखते हैं क्योंकि यदि उनके देशों के खिलाड़ियों को चुना जाता है तो उन्हें भी राशि मिलेगी जिसमें खिलाडि़यों की मैच फीस का हिस्सा शामिल है। दक्षिण अफ्रीका क्रिस मौरिस की नीलामी से खुश होगा जबकि वेस्टइंडीज बोर्ड सोच रहा होगा कि उसके 18 में से सिर्फ एक खिलाड़ी को ही क्यों चुना गया। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वेस्टइंडीज ने आइसीसी टी-20 विश्व कप दो बार जीता है।

इसके अलावा मैच विजेता और प्रभाव छोड़ने वाले खिलाड़ी जैसे क्रिस गेल, कीरोन पोलार्ड, ड्वेन ब्रावो, आंद्रे रसेल, सुनील नरेन और निकोलस पूरन को भी याद रखना चाहिए जो विभिन्न फ्रेंचाइजियों के पास हैं। कोई भी तुलना शायद ही कभी निष्पक्ष होती है लेकिन उनके प्रदर्शन को देखें और तब अन्य देशों के बड़ी राशि में बिकने वाले खिलाड़ियों को देखें और आप सहमत होंगे कि अधिक राशि खर्च करने वाले खिलाड़ियों की तुलना में वे अधिक अच्छा प्रदर्शन करते हैं।

पूल में रिकॉर्ड 35 ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी थे और आठ को तो फ्रेंचाइजियों ने कुछ अधिक कीमत पर खरीदा था। छह में से तीन न्यूजीलैंड के खिलाड़ी फिर से अच्छी कीमत पर बिक गए जबकि 18 में से वेस्टइंडीज का एक ही खिलाड़ी बिक पाया और करोड़ों की तुलना में वो भी महज 75 लाख रुपये में बिका। हम यही कह सकते हैं कि लॉटरी में कुछ को सही मिलता है तो कुछ को सबसे ज्यादा तो कुछ को बिल्कुल भी नहीं मिलता।

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