उत्तराखंड में पहली बार मगरमच्छों पर सैटेलाइट मानीटर्ड टैग, जानिए क्या होता है

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देहरादून। उत्तराखंड में अभी तक बाघ, गुलदार व हाथियों की निगरानी और व्यवहार में बदलाव के मद्देनजर अध्ययन के लिए उन पर रेडियो कालर लगाने मुहिम चल रही है। अब इस कड़ी में जलीय जीव भी शामिल होने जा रहे हैं। पहली बार मगरमच्छों पर सैटेलाइट मानीटर्ड टैग लगाए जाएंगे। हरिद्वार जिले के लक्सर क्षेत्र में मगरमच्छों पर टैग लगाने के सिलसिले में वन्यजीव विभाग की चार टीमें सर्वे में जुटी हैं। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जेएस सुहाग के अनुसार इस पहल से जहां मगरमच्छों पर निगरानी रखी जाएगी, वहीं इनके व्यवहार को लेकर भी अध्ययन किया जाएगा। फिर इसके आधार पर मानव-मगरमच्छ संघर्ष थामने को कदम उठाए जाएंगे।

वन्यजीव विविधता के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष भी निरंतर गहरा रहा है। गुलदार, हाथी, भालू व बाघ पहले ही मुसीबत का सबब बने हैं और अब मगरमच्छों ने भी नींद उड़ाई हुई है। हरिद्वार जिले के लक्सर क्षेत्र के 17 किलोमीटर के इलाके में मगरमच्छों के हमले की घटनाएं अक्सर सुर्खियां बनती हैं। ऐसे में मगरमच्छों के व्यवहार में भी बदलाव की आशंका जताई जा रही है।

इस सबको देखते हुए वन्यजीव महकमे ने अब मगरमच्छों के व्यवहार का भी अध्ययन करने का निश्चय किया है। राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जेएस सुहाग के अनुसार गंगा में पानी का प्रवाह बढ़ने पर मगरमच्छ गंग नहर से होते हुए लक्सर क्षेत्र में पहुंच जाते हैं। वहां ऐसे इलाके चिह्नित किए जा रहे हैं, जहां बीते 10 वर्षों में मगरमच्छों के हमले की घटनाएं हुई या फिर इनकी सक्रियता है। इसके लिए चार टीमें सर्वे में जुटी हैं। टीमें यह जानकारी भी जुटा रही हैं कि वहां मगरमच्छ कब-कब धूप सेंकने नहर से बाहर आते हैं।

मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने बताया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो.वीसी चौधरी और जर्मन फंडिंग एजेंसी जीआइजेड के तकनीकी सलाहकार प्रदीप मेहता की अगुआई में लक्सर क्षेत्र में मगरमच्छों पर सैटेलाइट मानीटर्ड टैग लगाने की मुहिम जल्द ही शुरू की जाएगी। इसके अलावा हरिद्वार जिले की झिलमिल झील में भी मगरमच्छ आ रहे हैं, वहां भी इसी तरह टैगिंग की जाएगी।

क्या है सैटेलाइट मानीटर्ड टैग

रेडियो कालर की तरह ही सैटेलाइट मानीटर्ड टैग एक प्रकार की चिप है। मगरमच्छ को पकड़कर उसकी पूंछ पर टैग फिट किया जाता है। फिर सैटेलाइट के जरिये उसके मूवमेंट की लगातार जानकारी मिलती है। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के अनुसार मगरमच्छों पर टैग से उनके मूवमेंट का पता लगेगा, जिससे संबंधित क्षेत्र में अलर्ट किया जा सकेगा।

व्यवहार का भी करेंगे अध्ययन

राज्य में पिछले साल हुई गणना के मुताबिक कार्बेट व राजाजी टाइगर रिजर्व के साथ ही छह जिलों हरिद्वार, देहरादून, पौड़ी, नैनीताल, चंपावत व पिथौरागढ़ के संरक्षित एवं आरक्षित क्षेत्रों की नदियों में मगरमच्छों की संख्या 451 है। अब मगरमच्छों पर टैग लगाकर इनके व्यवहार का अध्ययन किया जाएगा। मसलन, वे जमीन से बाहर कितनी देर और कब-कब रहते हैं। प्रतिदिन कितने किमी मूवमेंट करते हैं। ऐसे तमाम बिंदु इस अध्ययन में शामिल किए जाएंगे।

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